Monday, June 23, 2008

माँ नही रही, लेकिन ..............................
माँ नही रही लेकिन उनके लाड प्यार और यादें मौजूद हैं। उनके प्यार मानों आज भी जेहन में घूम रहे हैं। रात में साथ में सुलाना बगैर खाए सो जाने पर उठाकर खिलाना, नींद से आँखें नही खुले तो एक हाथ में दूध रोटी और दूसरा हाथ सर के पीछे रखकर जबरन मुंह में डालना ताकि खाना पेट में जा सके। लाख कहने पर कि नही खाऊँगा, सोने दो, नही समझती कहती रात को भूखे नही सोना चाहिए, जबतक नही खा लेता वह भी नही खाती, जब कभी रूठता काफी दुखी एवं उदास रहती थी। रूठकर नही खता तो बगैर खिलाये वह नही खाती।
छोटी सी खाट पर पुराने फटे साडी व धोती के हाथ से सिलाई किया बिस्तर, उसी तरह ओढ़ने का चादर, खाट इतनी छोटी कि सोने पर मानो उनके कलेजे में ही समां गया हूँ , अपने उंगलियाँ से माथा को सहलाना। जब उन्हें नींद खुलती मेरे माथे पर उँगलियों के द्वारा ढील खोजती। मिलाने पर उसे छोड़ती नही। उन्हें लगता था कि मेरे दुलारे को ढील खून चूस रहा है। गुस्सा हो दोनों नाखुनो के बीच में रखकर पीस देती तब जाकर राहत की साँस लेती, यह क्रिया लगातार घंटों रात में चला करता था।
सुबह जब देर तक सोया रहता था तो वे उठाती कहती कौवा कब से बोल रहा, सबेरे उठा प्यार से उठाती, समझाती सूर्योदय के पहले ब्रह्ममुहूर्त में जागना चाहिए। इस समय शारीर को अच्छी हवा मिलती है। जिससे स्वस्थ्य ठीक रहता है। सूर्योदय के बाद उठाने से अधकपारी होता है, न उठाने की जिद करता पर उन्हें लगता मेरा बेटा सवेरे न उठकर कुछ खोने वाला है, हांलाकि जीत अंततः उन्ही की होती थी।
थोडी सी छींक आने पर चिंतित हो जाती। बुखार आने पर डॉक्टर, वैद, ओझा, गुनी एक का भी दरवाजा नहीं छोड़ती, कभी गाँव के ब्यक्ति को बुलाकर नारी दिख्वाती बुखार कमा की नहीं है, तो वारली बना कर पिलाती, फुलकी रोटी, पुराने चावल के भात के साथ परवल का रस देती, जब खाने लगता तो उनके चेहरे पर खुशियाँ छलकने लगती।
जारे के समय, सुबह गाती बांध कर रखती, बोरसी के पास ही बैठने को कहती, धुप आँगन में आते ही बोरा बिछा कर बैठती, फिर कभी पैर देखती कभी गर्दन देखती, कभी कान के बगल की और झांकती, माथे पर उगे केश पर हाथ फेरती, तब धीरे-धीरे बोलती पैर, गर्दन और कान में मेल बैठ गया है, माथे के केश में लत्ते हो गया है आज दोपहर स्नान करना होगा, फिर क्या था स्नान के नाम पर रोंगटे खड़े हो जाते, रोने लगता, बावजूद इसके समझकर राजी कर लेती।
बरसात के दिनों में प्रत्येक रात पैर के उँगलियों के बीच देखती, कहती पैर में पानी लग गया है, मुर्दा शंख पीसकर खोलकर लगतीं, नहियल के तेल में कपूर डालकर लगाती। गर्मी में तो लू न लगे इसके लिए इसके लिए चिंतित रहती। इससे भी ज्यादा घमौरी और कलकल उन्हें चिंतित करता, जब घमौरी होता तो पुरे शरीर में लाल मिटटी लिपटी, कलकल हो जाने पर गाय के मूत्र पुरे शारीर में लगाती, आँख लाल होने या आ जाने पर कछुआ के हार को रगड़कर आँख में लगाती। तीनो ऋतू आने के पहले ही पूरी तैयारी कर लेती थी। सर्दी में पहले ही ओढ़ने का सामान और बोरसी बनाकर रख देती, बरसात के पहले मुर्दा शंख, गर्मी आने के पहले नीम का छाल का काढा बना कर रख देती थी, ताकि ऋतू परिवर्तन का असर न हो सके।
गोइठा के आग पर उबले लाल दूध, उसी से बने दही के छाली, मक्खन और घी मिलाने और खिलने के लिए परेशां रहती, इससे भी ज्यादा परेशान जिउतिया के भोर में खाने वाले सरगाही के पुआ, मरुआ के रोटी उठाकर खिलाने को जिद करती, बगैर खिलाये स्वयं नहीं खाती।
दुर्गापूजा, दीपावली एवं होली पर्व आनंद एवं खुशियाँ लेकर आता था जब दुर्गापूजा का नौरात्र शुरू होने वाला रहता था, उसके एक दिन पहले रात में नाभि में काजल का टीका लगा दिया जाता था, कपडा में हिंग बंधकर दाहिने हाथ के बांह में बांध दिया जाता था, धागे में नौ लहसुन का दाना गुंथकर गर्दन में पहना दिया जाता था और कहा जाता था की प्रत्येक दिन एक दाना खा लेना, ताकि दुर्गापूजा में कई तरह के डायन पिशाच अपने मनोकामना पूरा करने के प्रयास करते हैं। यदि यह सब पहने रहोगे तो कोई कुछ नहीं करेगा, दीपावली में पटाखा छोड़ते समय कही जले नहीं पास में खड़ी रहती थी। लुक्वारी फेंकने जाने को मन करती फिर भी जाया करता था। होलिका दहन के दिन से होली तक सक्रिय रहती थी कही कोई विवाद न हो जाये जब थोडा समय के लिए घर से निकला तो खोजने निकल जाती और पकड़कर घर ले आती।
माँ पूरी जिंदगी अपने लिए नहीं जी मनो मेरे लिए जी रही हो, उनके नजर में हम कभी बडे हुए ही नहीं। बाप बन जाने के बाद भी मुझे छोटा बच्चा ही समझती थी वही बबुआ कहकर ही बुलाती थी, पास बैठती थी फिर वही माथे के केश पर हाथ फेरती थी। जब में माँ के पास नहीं बैठ पाटा था तो उनके मन में लगता था की हम नाराज हैं और मुझे सफाई देना पड़ता था। पत्नी की तल्ख़ आवाज पर तुंरत कर देती की हमारे बबुआ के साथ ऐसे नहीं बोलो, पत्नी भी बडी सेवा आदर और सम्मान करती थी।
जबतक माँ रही बच्चा ही बना रहा। माँ नहीं है तो अब लग रहा है के जीवन का कई स्तर पार कर चूका हूँ। आज भी माँ अपनी ममता की चादर डाले हुए है जो इतनी वजनदार है की मुझसे हट नहीं पा रहा है।

3 comments:

Advocate Rashmi saurana said...

aapka lekh padhakar aakhon me aansu chalk aaye. aapne bilkul sahi likha hai maa aesi hi hoti hai.bhut aacha.likhate rhe.

समय चक्र said...

माँ की कमी हमेशा सभी को अखरती है . बहुत बढ़िया पोस्ट सराहनीय.धन्यवाद

Unknown said...

माँ दुनिया की अनमोल तोहफ़ा है ,माँ हमारी जीवन है हमारी मुक्तिदाता है.