Friday, June 27, 2008
छुटा पटाखा ................
पिता परदेश में काम करते हैं, वहीँ से घर खर्च के लिए पैसा भेजता है, पर्व के अवसर पर घर आते हैं।
दीपावली आनेवाले थे सबों के घर में साफ सफाई, पोती, रंग रोगन हो रहे थे, कोई चूना से अपने घर को पोत रहा था, को लाल मिटटी से घर पोत रहा था, तो कोई गोबर से ही घर को पोत रहा था, जिसका जिस तरह का सामर्थ्य था उस तरह दीपावली कि तैयारी के लिए घरों को साफ सफाई पोताई किये जा रहे थे। बच्चे-बच्चियां घरौंदा बनाती और खूब फटाखा फोड़ने की बात आपस में करते। इसमें सुखु नाम का वह बच्चा भी था जिनके पिता परदेश में कमाते थे, माँ के साथ रहता था, अपने पिता के हालत को वह नहीं समझता था क्योंकि बच्चा था। बच्चों के आपसी चर्चा से सुखु के मन में भी उत्सुकता हुआ कि पिता जी दीपावली में आयेंगे बहुत सारे फटाखे लायेंगे, में भी अन्य बच्चों के तरह उनके बीच में फोदुगा।
दीपावली के दो दिन पहले से ही सुखु माँ से पटाखा लेने का जिद्द करने लगा, उसके जिद्द को यह कह कर माँ टालती गयी कि अभी दो दिन बाकी है पिताजी लेकर आयेंगे, यह सुनकर सुखु के चेहरे खिल उठते खुशियों से कूदने लगता चिल्लाने लगता हम भी ढेर सरे पटाखे छोडेंगे।
दीपावली के सुबह सुखु उठता है। माँ से पूछता है माँ पिता जी आये माँ निरुत्तर हो जाती है। सुखु कहता है माँ आज ही दीपावली है। सबों का पटाखा आ गया है, मेरा भी आ जायेगा न, माँ फिर भरोसा दिलाती हैकि हाँ शाम तक तुम्हारे पिता जी लेकर आ जायेंगे। यह सुनकर कूदने गली में जाता है अपने दोस्तों को कहता है हमारा भी फटाखा शाम तक पिताजी लेकर आयेंगे।
इसी बीच खबर आती है कि सुखु के पिताजी नहीं आ पाएंगे क्योंकि जहाँ वह काम करते थे पैसा नहीं मिल पाया था यह सुचना पाकर सुखु कि माँ बहुत मायूस हो गयी, एक तरफ पटाखा के बच्चे का जिद्द और दुसरे तरफ घर में खाने के लिए एक छटाक अनाज नहीं, बडी मुश्किल हो गयी, सुखु का जिद्द तो पूरा करना असंभव है, रहा किसी तरह घर में चूल्हा जलाना वह तो सेठ जी से उधार लेकर भी कर लूंगी, यही सोच में बैठी रही। संध्या होने वाला था इसी बिच सुखु फिर माँ के पास आकर कहता है। माँ पिताजी कब आयेंगे शाम होने जा रहा है कब पटाखा आएगा, कब छोदुँगा। कभी माँ का गाल पकड़कर उत्तर चाह रहा था कभी उनके माथे का बाल नोच कर उत्तर चाह रहा था, पर उसकी माँ चुपचाप मूर्ति की तरह बैठी थी। उत्तर न मिलने पर सुखु हाथ, पैर पटककर रोने लगा, तब माँ बोले बेटा अभी में जाकर ला देती हूँ।
सूर्यास्त हो चूका था सभी के मकानों पर दीपक जलाने की तैयारी हो रही थी, सुखु की माँ हाथ में झोला लिए सेठ जी के दूकान पर जाती है कहती है सेठ जी सुखु के पिताजी नहीं आ पाए हैं। घर में खाने के लिए एक छटांक अनाज नहीं थोडा नहीं है थोडा उधार दे दें तो उनके आने पर पैसा दे देंगे। यह सुनते ही सेठ जी आगबबूला हो गया कहने लगा कि पहले का पैसा तो मिला नहीं अब कहाँ उधार दूंगा। सुखु की माँ कहने लगी कि सेठ जी आज पर्व का दिन है, विश्वास दिलाती हूँ कि उनके आते ही सबसे पहले आप का ही क़र्ज़ चूका दूँगी। लाख समझाने के बाद सेठ जी नहीं माने बेचारी उदास होकर घर लौटने लगी, मन ही मन सोच रही थी कि हम तो भूखे रह सकते हैं मेरा सुखु कैसे भूखे रह सकता है, जैसे ही अपने घर के दरवाजे पर पैर राखी वैसे ही सुखु दौड़ता हुआ आया कहने लगा माँ फटाखा लायी कभी माँ के कमर को देखता जब कही नजर नहीं पडा तो रोने लगा बच्चा को रोते देख मनो उसकी माँ का कलेजा ही दो फांक हो गया।
गाँव में फटाखा छोड जाने लगे फट फट ,सर सर कि आवाज गूंजने लगी सुखु रोते हुए कहने लगा माँ सभी फटाखे छोड़ रहे हैं हम कब छोडेंगे। माँ दिलासा दिलाती रही सुखु रोता रहा यह क्रम नौ बजे रात्रि तक चलता रहा। सुखु रोते रोते सो जाता है। भूख की चिंता न थी न आज उसे लगा। सुखु कि माँ भी किवाड़ बंद कर बेटे को कलेजे से लगा कर सो जाती है।
सुबह छः बजे सुखु की माँ की नींद खुलती है। नींद खुलते सुखु को न देख घबडा जाती है। चारो तरफ नजर दौड़ने लगती है, घर का किवाड़ खुला, सुखु नहीं और भी बेचैनी बढ़ी। इसी बीच पहने हुए कुरता में कुछ लेकर सुखु आता है , माँ दौडी बेटा कहाँ चला गया सुखु ने कुरता में लाये चीजों को दिखाते हुए कहा माँ यह फटाखा हिया। माँ बोलती है नहीं बेटा यह फटाखा नहीं, छूटा फटाखा है।
Monday, June 23, 2008
माँ नही रही लेकिन उनके लाड प्यार और यादें मौजूद हैं। उनके प्यार मानों आज भी जेहन में घूम रहे हैं। रात में साथ में सुलाना बगैर खाए सो जाने पर उठाकर खिलाना, नींद से आँखें नही खुले तो एक हाथ में दूध रोटी और दूसरा हाथ सर के पीछे रखकर जबरन मुंह में डालना ताकि खाना पेट में जा सके। लाख कहने पर कि नही खाऊँगा, सोने दो, नही समझती कहती रात को भूखे नही सोना चाहिए, जबतक नही खा लेता वह भी नही खाती, जब कभी रूठता काफी दुखी एवं उदास रहती थी। रूठकर नही खता तो बगैर खिलाये वह नही खाती।
छोटी सी खाट पर पुराने फटे साडी व धोती के हाथ से सिलाई किया बिस्तर, उसी तरह ओढ़ने का चादर, खाट इतनी छोटी कि सोने पर मानो उनके कलेजे में ही समां गया हूँ , अपने उंगलियाँ से माथा को सहलाना। जब उन्हें नींद खुलती मेरे माथे पर उँगलियों के द्वारा ढील खोजती। मिलाने पर उसे छोड़ती नही। उन्हें लगता था कि मेरे दुलारे को ढील खून चूस रहा है। गुस्सा हो दोनों नाखुनो के बीच में रखकर पीस देती तब जाकर राहत की साँस लेती, यह क्रिया लगातार घंटों रात में चला करता था।
सुबह जब देर तक सोया रहता था तो वे उठाती कहती कौवा कब से बोल रहा, सबेरे उठा प्यार से उठाती, समझाती सूर्योदय के पहले ब्रह्ममुहूर्त में जागना चाहिए। इस समय शारीर को अच्छी हवा मिलती है। जिससे स्वस्थ्य ठीक रहता है। सूर्योदय के बाद उठाने से अधकपारी होता है, न उठाने की जिद करता पर उन्हें लगता मेरा बेटा सवेरे न उठकर कुछ खोने वाला है, हांलाकि जीत अंततः उन्ही की होती थी।
थोडी सी छींक आने पर चिंतित हो जाती। बुखार आने पर डॉक्टर, वैद, ओझा, गुनी एक का भी दरवाजा नहीं छोड़ती, कभी गाँव के ब्यक्ति को बुलाकर नारी दिख्वाती बुखार कमा की नहीं है, तो वारली बना कर पिलाती, फुलकी रोटी, पुराने चावल के भात के साथ परवल का रस देती, जब खाने लगता तो उनके चेहरे पर खुशियाँ छलकने लगती।
जारे के समय, सुबह गाती बांध कर रखती, बोरसी के पास ही बैठने को कहती, धुप आँगन में आते ही बोरा बिछा कर बैठती, फिर कभी पैर देखती कभी गर्दन देखती, कभी कान के बगल की और झांकती, माथे पर उगे केश पर हाथ फेरती, तब धीरे-धीरे बोलती पैर, गर्दन और कान में मेल बैठ गया है, माथे के केश में लत्ते हो गया है आज दोपहर स्नान करना होगा, फिर क्या था स्नान के नाम पर रोंगटे खड़े हो जाते, रोने लगता, बावजूद इसके समझकर राजी कर लेती।
बरसात के दिनों में प्रत्येक रात पैर के उँगलियों के बीच देखती, कहती पैर में पानी लग गया है, मुर्दा शंख पीसकर खोलकर लगतीं, नहियल के तेल में कपूर डालकर लगाती। गर्मी में तो लू न लगे इसके लिए इसके लिए चिंतित रहती। इससे भी ज्यादा घमौरी और कलकल उन्हें चिंतित करता, जब घमौरी होता तो पुरे शरीर में लाल मिटटी लिपटी, कलकल हो जाने पर गाय के मूत्र पुरे शारीर में लगाती, आँख लाल होने या आ जाने पर कछुआ के हार को रगड़कर आँख में लगाती। तीनो ऋतू आने के पहले ही पूरी तैयारी कर लेती थी। सर्दी में पहले ही ओढ़ने का सामान और बोरसी बनाकर रख देती, बरसात के पहले मुर्दा शंख, गर्मी आने के पहले नीम का छाल का काढा बना कर रख देती थी, ताकि ऋतू परिवर्तन का असर न हो सके।
गोइठा के आग पर उबले लाल दूध, उसी से बने दही के छाली, मक्खन और घी मिलाने और खिलने के लिए परेशां रहती, इससे भी ज्यादा परेशान जिउतिया के भोर में खाने वाले सरगाही के पुआ, मरुआ के रोटी उठाकर खिलाने को जिद करती, बगैर खिलाये स्वयं नहीं खाती।
दुर्गापूजा, दीपावली एवं होली पर्व आनंद एवं खुशियाँ लेकर आता था जब दुर्गापूजा का नौरात्र शुरू होने वाला रहता था, उसके एक दिन पहले रात में नाभि में काजल का टीका लगा दिया जाता था, कपडा में हिंग बंधकर दाहिने हाथ के बांह में बांध दिया जाता था, धागे में नौ लहसुन का दाना गुंथकर गर्दन में पहना दिया जाता था और कहा जाता था की प्रत्येक दिन एक दाना खा लेना, ताकि दुर्गापूजा में कई तरह के डायन पिशाच अपने मनोकामना पूरा करने के प्रयास करते हैं। यदि यह सब पहने रहोगे तो कोई कुछ नहीं करेगा, दीपावली में पटाखा छोड़ते समय कही जले नहीं पास में खड़ी रहती थी। लुक्वारी फेंकने जाने को मन करती फिर भी जाया करता था। होलिका दहन के दिन से होली तक सक्रिय रहती थी कही कोई विवाद न हो जाये जब थोडा समय के लिए घर से निकला तो खोजने निकल जाती और पकड़कर घर ले आती।
माँ पूरी जिंदगी अपने लिए नहीं जी मनो मेरे लिए जी रही हो, उनके नजर में हम कभी बडे हुए ही नहीं। बाप बन जाने के बाद भी मुझे छोटा बच्चा ही समझती थी वही बबुआ कहकर ही बुलाती थी, पास बैठती थी फिर वही माथे के केश पर हाथ फेरती थी। जब में माँ के पास नहीं बैठ पाटा था तो उनके मन में लगता था की हम नाराज हैं और मुझे सफाई देना पड़ता था। पत्नी की तल्ख़ आवाज पर तुंरत कर देती की हमारे बबुआ के साथ ऐसे नहीं बोलो, पत्नी भी बडी सेवा आदर और सम्मान करती थी।
जबतक माँ रही बच्चा ही बना रहा। माँ नहीं है तो अब लग रहा है के जीवन का कई स्तर पार कर चूका हूँ। आज भी माँ अपनी ममता की चादर डाले हुए है जो इतनी वजनदार है की मुझसे हट नहीं पा रहा है।
Wednesday, June 18, 2008
२५ तुगलक रोड, नयी दिल्ली, तारिक १० जून २००७, रात्रि ८:३० बजे
राष्ट्रीय कार्यकारिणी का भोज। कुर्सियां लगी थीं, मंच बने थे, जिसपर कव्वाली गाने वाले बैठे थे , साज बजा रहे थे, में सबसे पीछे लगे कुर्सी पर बैठकर देखता रहा, मालूम हुआ कि १२ बजे रात्रि के बाद केक कटे जायेंगे। मेरी जिज्ञासा बढ़ी कि आज अच्छे अच्छे गोरे गोरे और बढिया पोषक वालों को देखने का अवसर मिलेगा। ठंढे पानी, लस्सी, जूस एवं तिनका लगाकर खाने का सामान बैठे लोगों को दिया जा रहा था, खड़े लोगों को भी दिए जा रहे थे। कव्वाली शुरू हुआ, एक दुसरे का जवाब तलब जन्मदिन के बधाई के साथ शुरू हुआ। सुरेन्द्र शर्मा के साथ कई हास्य कवि अपनी हास्य कविता से लोगों को हंसाते हंसाते पेट में दर्द कर दिया था।
में आशा से देखता रहा कि कब अच्छे अच्छे एवं गोरे, अच्छे पोषक वाले आयेंगे, में अपने इर्द गिर्द, अगल बगल] आगे पीछे व मुख्या द्वार की ओर टकटकी लगा देखता रह गया, पर मेरी आँखें थक गयीं। खाने का हुक्म हुआ, माकन के पीछे कई तरह के ब्यंजन लगे थे। मुझको लगा कि खाने के स्थान पर मिलेंगे, पर निराशा ही मिली। अपने मन को सांत्वना दिलाया, ११ बजे रात्रि के बाद केक काटना है, उस समय ही लोग आयेंगे। १२ बज चूका था, केक टेबल पर रखने कि तयारी चलने लगी, तब लगा, आ ही रहे होंगे। केक कटे गए, जन्मदिन की बधाइयाँ, तली , गुलदस्ता, बुके एवं मालाएं दी जाने लगीं। में टकटक देखता रहा, मेरे मन में असहज की पीडा दौरान लगी। कोई नहीं आया। आया वाही जिनके वस्त्र गंदे थे। गरीबी, लाचारी, फिर भी सुदामा की तरह कृष्ण को देखने के लिए लालायित। उद्घोषणा हुआ कार्यकर्म समाप्ति का। लोग जाने लगे, इसी बीच एक नेता ने कहा कल श्रीमती सोनिया गाँधी, प्रधान मंत्री, मंत्रिगन, सांसदों एवं परिवार वालों के बीच में खाना है। तब फिर मेरा मन उद्देलित हुआ। कल अच्छे और महत्वपूर्ण लोग आयेंगे। साफ सुथरे और अच्छे डिजाईन वाले पोशाक देखने को मिलेंगे। पर सुना की सबको जाने की इजाजत नहीं है। यह सुनकर में धरातल पर आ गया। मेरा सपना टूट गया, काफी गमगीन हुआ। दिल्ली के अच्छे लोगों को नहीं देख पाउँगा। पटना जाकर लोगों को क्या बतलाऊंगा? घर में पत्नी पूछेगी - बहुत बडे एवं अछे लोगों को आप देखे होंगे, उस समय मुझे कितनी शर्मिंदगी होगी। यह सब मेरे मन में बिजली की प्रवाह से आ जा रहे थे। मन क्रोधी हो रहा था। तरह तरह की बातें दिमाग में विचरण कर रहे थे, मन को समझाने की कोशिश कर रहा था। इसी बीच मेरे मोबाइल की घंटी बजती है। समय ६:३० बजे संध्या उदास मन से मोबाइल खोल कर कान से लगाया, मेरे एक राजनितिक मित्र , आदेश हुआ की ७:१५ बजे तक २५ तुगलक रोड चले आयें। मन को विश्वास ही नहीं हो रहा था।
ठीक सात बजे गेट पर गया। अन्दर जाने का हुक्म हुआ। फिर वही कुर्सियां, कुछ सोफे और वही मंच जिसपर गीत गाने वाले कलाकार अपने गीतों से लोगों के मन को आनंदित कर रहे थे। हरियाणा का कृष्णलीला गान सुनकर मन मुग्ध हो रहा था। सुरेन्द्र शर्मा हास्य कवि भी लोगों को हंसी से झकझोर रहे थे।
मेरी आँखें मुख्या द्वार पर टिकी थीं, कैसे और कौन लोग आते हैं। श्रीमती सोनिया जी आयीं, प्रधानमंत्री आयें, मंत्री एवं संसद आये। रुके और चले गए। पर बडे और वजनदार अच्छे लोग नहीं आये। सारा मैदान और कुर्सियां अधिकतर उन्हीं लोगों से भरा पता था, जिनके पैर में जूते नहीं थे, पर में हवाई चप्पल, प्लास्टिक का चप्पल, शारीर पर गंदे पते कपडे, पुराणी मटमैली धोती, गर्मी से कपडे भींगे हुए, चेहरे गीली मानों अभी स्नान कर निकला हो। पसीने का दुर्गन्ध। यह देखर में अचंभित रहा तब में असलियत और हकीकत पर आया, जिस नेता के घर पर हैं वह नेता बडे लोगों का नहीं, बेसहारा, गरीब, दबे कुचले असहाय बेजुबान लोगों का है।
बैठे बैठे मेरा दिमाग उस दिवंगत नेता स्वर्गीय जननायक कर्पूरी ठाकुर को देखने लगा जिसके जीवन से लेकर मरण तक ऐसे लोग घेरे रहते थे। ठीक येही स्थिति पटना से १००० किलोमीटर दूर दिल्ली के २५ तुगलक रोड में देखने को मिला।
