२५ तुगलक रोड, नयी दिल्ली, तारिक १० जून २००७, रात्रि ८:३० बजे
राष्ट्रीय कार्यकारिणी का भोज। कुर्सियां लगी थीं, मंच बने थे, जिसपर कव्वाली गाने वाले बैठे थे , साज बजा रहे थे, में सबसे पीछे लगे कुर्सी पर बैठकर देखता रहा, मालूम हुआ कि १२ बजे रात्रि के बाद केक कटे जायेंगे। मेरी जिज्ञासा बढ़ी कि आज अच्छे अच्छे गोरे गोरे और बढिया पोषक वालों को देखने का अवसर मिलेगा। ठंढे पानी, लस्सी, जूस एवं तिनका लगाकर खाने का सामान बैठे लोगों को दिया जा रहा था, खड़े लोगों को भी दिए जा रहे थे। कव्वाली शुरू हुआ, एक दुसरे का जवाब तलब जन्मदिन के बधाई के साथ शुरू हुआ। सुरेन्द्र शर्मा के साथ कई हास्य कवि अपनी हास्य कविता से लोगों को हंसाते हंसाते पेट में दर्द कर दिया था।
में आशा से देखता रहा कि कब अच्छे अच्छे एवं गोरे, अच्छे पोषक वाले आयेंगे, में अपने इर्द गिर्द, अगल बगल] आगे पीछे व मुख्या द्वार की ओर टकटकी लगा देखता रह गया, पर मेरी आँखें थक गयीं। खाने का हुक्म हुआ, माकन के पीछे कई तरह के ब्यंजन लगे थे। मुझको लगा कि खाने के स्थान पर मिलेंगे, पर निराशा ही मिली। अपने मन को सांत्वना दिलाया, ११ बजे रात्रि के बाद केक काटना है, उस समय ही लोग आयेंगे। १२ बज चूका था, केक टेबल पर रखने कि तयारी चलने लगी, तब लगा, आ ही रहे होंगे। केक कटे गए, जन्मदिन की बधाइयाँ, तली , गुलदस्ता, बुके एवं मालाएं दी जाने लगीं। में टकटक देखता रहा, मेरे मन में असहज की पीडा दौरान लगी। कोई नहीं आया। आया वाही जिनके वस्त्र गंदे थे। गरीबी, लाचारी, फिर भी सुदामा की तरह कृष्ण को देखने के लिए लालायित। उद्घोषणा हुआ कार्यकर्म समाप्ति का। लोग जाने लगे, इसी बीच एक नेता ने कहा कल श्रीमती सोनिया गाँधी, प्रधान मंत्री, मंत्रिगन, सांसदों एवं परिवार वालों के बीच में खाना है। तब फिर मेरा मन उद्देलित हुआ। कल अच्छे और महत्वपूर्ण लोग आयेंगे। साफ सुथरे और अच्छे डिजाईन वाले पोशाक देखने को मिलेंगे। पर सुना की सबको जाने की इजाजत नहीं है। यह सुनकर में धरातल पर आ गया। मेरा सपना टूट गया, काफी गमगीन हुआ। दिल्ली के अच्छे लोगों को नहीं देख पाउँगा। पटना जाकर लोगों को क्या बतलाऊंगा? घर में पत्नी पूछेगी - बहुत बडे एवं अछे लोगों को आप देखे होंगे, उस समय मुझे कितनी शर्मिंदगी होगी। यह सब मेरे मन में बिजली की प्रवाह से आ जा रहे थे। मन क्रोधी हो रहा था। तरह तरह की बातें दिमाग में विचरण कर रहे थे, मन को समझाने की कोशिश कर रहा था। इसी बीच मेरे मोबाइल की घंटी बजती है। समय ६:३० बजे संध्या उदास मन से मोबाइल खोल कर कान से लगाया, मेरे एक राजनितिक मित्र , आदेश हुआ की ७:१५ बजे तक २५ तुगलक रोड चले आयें। मन को विश्वास ही नहीं हो रहा था।
ठीक सात बजे गेट पर गया। अन्दर जाने का हुक्म हुआ। फिर वही कुर्सियां, कुछ सोफे और वही मंच जिसपर गीत गाने वाले कलाकार अपने गीतों से लोगों के मन को आनंदित कर रहे थे। हरियाणा का कृष्णलीला गान सुनकर मन मुग्ध हो रहा था। सुरेन्द्र शर्मा हास्य कवि भी लोगों को हंसी से झकझोर रहे थे।
मेरी आँखें मुख्या द्वार पर टिकी थीं, कैसे और कौन लोग आते हैं। श्रीमती सोनिया जी आयीं, प्रधानमंत्री आयें, मंत्री एवं संसद आये। रुके और चले गए। पर बडे और वजनदार अच्छे लोग नहीं आये। सारा मैदान और कुर्सियां अधिकतर उन्हीं लोगों से भरा पता था, जिनके पैर में जूते नहीं थे, पर में हवाई चप्पल, प्लास्टिक का चप्पल, शारीर पर गंदे पते कपडे, पुराणी मटमैली धोती, गर्मी से कपडे भींगे हुए, चेहरे गीली मानों अभी स्नान कर निकला हो। पसीने का दुर्गन्ध। यह देखर में अचंभित रहा तब में असलियत और हकीकत पर आया, जिस नेता के घर पर हैं वह नेता बडे लोगों का नहीं, बेसहारा, गरीब, दबे कुचले असहाय बेजुबान लोगों का है।
बैठे बैठे मेरा दिमाग उस दिवंगत नेता स्वर्गीय जननायक कर्पूरी ठाकुर को देखने लगा जिसके जीवन से लेकर मरण तक ऐसे लोग घेरे रहते थे। ठीक येही स्थिति पटना से १००० किलोमीटर दूर दिल्ली के २५ तुगलक रोड में देखने को मिला।

3 comments:
जायज़ ही हुई तलाश और उम्दा-दिलचस्पी भरा लेख. बहुत खुबसूरत. लिखते रहिये.
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उल्टा तीर
उल्टा तीर निष्कर्ष
राजधानी में राजनैतिक भोजों की सही तस्वीर खींची है आपने, नियमित लिखें. शुभकामनाए.
नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.
-समीर लाल
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